Monday, March 5, 2018

Mantra

मैं चिराग हूँ,

जलना मेरी  नियति है,

मेरे जलने से कई घर रोशन होते हैं,

होती हैं रोशन कई जिंदगियां,

जलते बुझते कई युग गुजरे,

बीते कई दिन रैन,

जला कर खाक करने की भी ,

ताकत  मैँ  हूँ रखती ,


जलना औऱ जलाना ही सच्चाई है जमाने की,

जिसे  तुम क्रोध कहते  हो वह भी तो अग्नि ही है ,

तुम्हें एक बात बताती हूँ ...पते की बात बताती हूँ -

प्रेम का मूलमंत्र अपनाओ ||

प्यार ,बस प्यार ही बचा सकता है मानवता को ,

आओ तुम हम मिल सार्थक करें ...

जीने वाले हर जीवन को ,

रौशनी से भर दें  ||






Tuesday, September 12, 2017

क्या यहीं जि न्दंगी है?

क्या यहीं जि न्दंगी है?

क्या खोते रहते का दूसरा नाम
जि ंदगी है?
एक आँख में हँसी
तो दूसरी में नमी
का नाम जि ंदगी है?
आईए और दाँव लगाते जाईए
शायद इसी जुए का नाम जि ंदगी है!
कहीं ठहरे हुए जल में
कमल दल में
ओस की बूँद को तो
जि ंदगी कहते नहीं?
गमों की घूंट पीते जाईए
नश्तर चूभें भी तो
पीर बीच खुद को डूबोते जाईए,
मुस्कुराईए, मुस्कुराईए
क्योंकि दर्द के बीच मुस्कुराना ही तो
जि ंदगी है।

आदरणीय अटल बि हारी बाजपेयी जी के नाम

आदरणीय अटल बि हारी बाजपेयी जी के नाम

अंद्धरूनी सत्य लि ए हृदय बीच
टलता रहा समय
लम्हों में सरकती रही जि न्दगानी
बि ना कि सी बि गुल के
हारती हुई नारायणी सेना
रीझ उठी, झूम उठी
बासन्ती हवा मदमस्त हुई
जलती रही थी धरा सदि यों से
पेड़ों ने भी अपनाई खामोशी
इन्हें तुमने सहलाया है... ।

Friday, June 15, 2012

मिले हो तुम





मिले हो तुम माँगना क्या रब से।
ये हाथ उठेंगे न कभी
दआु के लिए,

जिसे देखा नहीं कभी
न महसूस ही किया है

जीना भी क्या उस
खुदा के लिए

स्वप्न सलोना हो तुम
मिल जाओ आकर मुझसे
सदा के लिए,

इक प्यास हाँ
इक प्यास ही है,

जो बसती दो साँसो बीच कभी
कभी बसती दो नयन बीच
नीर बन तुम्हारी इक अदा के लिए

***

अनारकली




बदरंग दीवारो की तरह
चकते उभर आए हैं
मेरा दिल जैसे
इक सूना कमरा
बंद दीवारों के बीच
घुट रही हूँ
बाहर
कौन?
क्या ?
कहाँ?
मैं तो चुन दी गई हूँ
अनारकली की तरह।

***

Friday, June 1, 2012

मीरा की पीर






आसमान पर घिरी घटाएँ
जिस तरह,
मन पर .. तुम्हारी यादें
वैसे ही
वो बरसें न बरसें
पर ये सिर्फ बरसना
ही जानती हैं

कब, कहाँ मेरा कहा मानती हैं,
जीवन भर की पीड़ा सिमट आई है,
दो नयनों के बीच
जाने कि तना जल है
अवि रल धार,
विपुल धार,
लिए –

अस्तित्वहीन,
दरस बिन
वजूद खोते हैं,



चुपचाप आते हैं,
जाते हैं,
क्या ये पलायन है
यथार्थ से?
ऎसा तो नहीं लगता
इस ‘मीरा के कृष्ण’
तुम कहाँ हो?

पाषाण था वो भी
और तुम भी,
एक चोट, एक दर्द,
जो दिया तुमने
कब तक संभालती रहूँ
तुम मूक रहो
स्थिर रहो

जग करे तुम्हारी
आराधना,
मैं अस्थिर रहूँ
बिह्वल रहूँ
मेरी होती रहे
भर्त्स ना क्यों?

फिर भी कहीं
अर्न्तमन में
कोई तुष्टि है,
इस पीड़ा में ही
कहीं कोई संतुष्टि तो है

दो और दो स्वीकार्य
मुझे है,

पीड़ा में, आँसुओं में
तुम्हे ही पाती हूँ
सारे साधन बन जाते हैं
सारे दर्पण बन जाते हैं,
लताओं से, वृक्षों से
सीता का पता पूछने वाले
राम की भांति
सबमें तुम्हे ही पाती हूँ –
‘हे मेरे कृष्ण’ तुम पाषाण ही रहो।

***

प्रेम



बेशकीमती हैं पल तुम्हा रे
यँू ख्वाबों में आया न करो

माना हृदय में
उमड़ता प्यार बहुत है,
कहूँ क्या बेबस याद बहुत है
न कहीं उभड़ पाया तो क्या ?
आँसुओं संग ढुलक जाएगा
माटी संग मिल हर रुत में,

नए-नए रुप धरेगा
आएगी जो वर्षा तो
महक उठेगी धरती
सोंधी महक से,
मेरा प्यार ही तो होगा
रुत बदलेगी
रूप रंग बदल जाते हैं जैसे,

वैसे ही मेरा प्यार,
धरती की उमस में,
कसमसाता सा
नवरूप धरेगा।

 
आएगी जो शिशिर
रंगबिरंगे फूलों में
छवि उसकी ही होगी

बदलती भावों की तरह
वह फिर बदलेगा
उष्मा कैसे वह इतनी सहेगा?
ताप हरने को
बिखरने से पहली ही
फिर से, वह रंग बदलेगा

हाँ, तुम देख लेना,
मेरा प्यार वहीं कहीं
तुम्हारे ही आस-पास
सफेद लिली के रूप में
हँस रहा होगा कि
तुम छूलो एक बार उसे।

***